Sunday, February 12, 2012

# चौथा पुत्र

दोस्तों,महाबली वेताल के जन्म-मास उत्सव को मनाते हुए हम आज एक और लोमहर्षक वेताल कथा पर बात करेंगे जो अपने-आप में कई कारणों से विशिष्ट हैं । यह एक ऐसी कथा है जिसमे कई वेताल मानकों और स्थापित परम्पराओं को तोड़ा गया है और मज़े की बात यह है की इन मानकों को किसी और ने नहीं बल्कि खुद ली-फ़ाल्क ने तोड़ा है और मुझे भरपूर शुबहा है कि इन तथ्यों कि तरफ़ शायद ही पहले किसी का ध्यान गया हो । 

क्या हैं वो वेताल परम्पराएं और क्या हैं वो मानक इन पर हम आगे तो बात करेंगे ही लेकिन उससे पहले बात करते हैं इस कहानी की अन्य विशेषताओं पर ।  वेताल-पुरखों के कारनामों पर आधारित कथाएँ हमेशा से सामान्य से अधिक रोमांचक और दिलचस्प हुआ करती हैं और यदि कथा खुद फ़ाल्क द्वारा लिखित हो तो फिर क्या कहने ! 

ऐसी ही एक सन्डे कथा है S-137,'The Fourth Son' या 'चौथा पुत्र' जो अख़बारों में नज़र आई थी 18 अगस्त 91 से लेकर 17 मई 1992 तक यानि की इंद्रजाल कॉमिक्स के दु:खद अवसान(1990) के उपरांत जिसकी वजह से यह कहानी इंद्रजाल कॉमिक्स के पन्नो की शोभा तो न बन सकी लेकिन डायमंड कॉमिक्स के डाईजेस्ट न.61/62 में अवश्य ही इसने अपनी सतरंगी छटा बिखेरी ।
























इस कहानी में वेताल-परिवार की उन बातों की तरफ़ तवज्जो दिलाई गयी थी जिन्हें एक आम वेताल पाठक  काफी अरसे से सोचता आ रहा था जैसे की क्या किसी वेताल पुत्र ने अपनी परंपरा के प्रति अरुचि नहीं दिखाई,क्या वेताल परिवार में हमेशा सिर्फ़ हट्टे-कट्टे,हरफ़नमौला,स्वस्थ शरीर और मानसिकता वाले अति-प्रतिभाशाली उच्च चरित्र वाले लड़को ने ही जन्म लिया,क्या कभी कोई 'कमज़ोर' और 'अनफिट' वेताल नहीं हुआ,क्या कभी कोई वेताल 'अशिक्षित' नहीं रहा,क्या हमेशा से परिवार का बड़ा बेटा ही वेताल बनता रहा !  

इस कहानी में ली-फ़ाल्क ने पाठकों की इन सहज जिज्ञासाओं का उत्तर दिया है और बताया है की आँठवे वेताल के चार पुत्रों में से बड़े तीन पुत्रों ने अपने परिवार की परंपरा अपनाने से इंकार किया जिसके फलस्वरूप अशिक्षित और शारीरिक रूप से विषमता लिए हुए चौथे पुत्र ने बावजूद अपने छोटे कद के परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाया । 



















बांदार बौनों को हमेशा ही वेताल को एक पूज्यनीय स्वरुप में लेते हुए दिखाया गया है,यहाँ तक की शुरूआती कहानियों में बांदार बौनों के बीच वेताल का दर्जा जंगल का देवता या मालिक जैसा दर्शाया गया है तो क्या कोई कल्पना भी कर सकता था की यही बांदार कभी वेताल की हंसी या मज़ाक उड़ाने के बेअदबी भी कर सकते हैं !! 

लेकिन ऐसा हुआ और ऐसा राजनैतिक और कूटनैतिक कारणों से ली फ़ाल्क ने इसलिए और दर्शाया जिससे की बीसवी शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रकाशित इस कहानी में वेताल और अश्वेत बांदारों का रिश्ता मालिक-सेवक की बजाये एक दुसरे का सम्मान करने वाले पुश्तैनी मित्रों का ज़्यादा लगे । 













इस कहानी की एक और खासियत है और वो यह की इस कहानी में किसी भी वेताल की मृत्यु का विस्तृत वर्णन है जो इससे पहले की कहानियों में सिर्फ़ सांकेतिक रूप से या बड़े ही संक्षिप्त तरीके से बताया जाता रहा था । इस कथा में आँठवे वेताल की मृत्यु क्यों और कैसे हुई इसका विस्तृत तरीके से वर्णन किया गया है जोकि इस कथा को विशिष्टता प्रदान करती है वर्ना इससे पहले की कथाओं में किसी भी वेताल की मौत कैसे हुई इसपर कभी भी अच्छी तरह से रौशनी नहीं डाली गई ।























आपको यह जानकर भी हैरानी होगी की ली-फ़ाल्क ने वेताल की धार्मिक आस्था उजागर करने के प्रति बड़ी सतर्क-उदासीनता दिखाई है ।  क्या आपको ऐसी किसी स्ट्रिप या कहानी याद है जिसमे वेताल की आस्तिकता या नास्तिकता को खुल कर प्रकट किया हो !! शायद नहीं ना !! क्योंकि ऐसी कहानियां बहुत ही कम हैं जिसमे वेताल की ईश्वर के प्रति आस्था या विश्वास की झलक मिलती हो या फ़िर किसी भी दृश्य में वेताल को ईश्वर का नाम लेते चित्रित किया गया हो । 

मौजूदा कहानी इस बात के लिए भी ख़ास श्रेणी में लायी जा सकती है क्योंकि इस कहानी में बड़े ही साफ़ तौर से वेताल की आस्तिकता के दर्शन होते हैं ।  ज़रा गौर फरमाइए इस पैनल पर जिसमे जातुन खान के दरबार में वेताल को शासक के सामने घुटनों के बल पेश होने का निर्देश दिया जाता है और वेताल बड़े ही स्वाभिमानी शब्दों में कहता है की "मैं सिवाय खुदा के किसी और के सामने घुटने नहीं टेकता" । 









शुरू की कहानियों में कभी भी वेताल को ईश्वर का ज़िक्र करते नहीं पढ़ा गया है जिसकी एक ही वजह समझ में आती है की फ़ाल्क पाठकों को प्रार्थना के बजाये कर्म पर ज़्यादा विश्वास कर अपनी समस्याएं सुलझाने का सन्देश देने में विश्वास रखते होंगे ।  लेकिन जब बाद के वर्षों में वेताल आलोचकों/अनुसंधानियों ने वेताल की आस्तिकता/नास्तिकता पर प्रश्न उठाये तब जाकर कहीं फ़ाल्क ने वेताल की आस्था को साफ़ तौर से उजागर करना ज़रूरी समझा ।

चलिए अब बात करते हैं उन वेताल मानकों की जिन्हें किसी और ने नहीं बल्कि खुद ली-फाल्क ने तोड़ा । यह तो आप जानते ही हैं की किसी भी वेताल का चेहरा और आँखे पाठकों को कभी नहीं दिखाई जाती और ऐसे अवसरों पर जहाँ वेताल ने नकाब नहीं पहना होता वहां उसके चेहरे/आँखों को परछाईं आदि से छुपा दिया जाता था । अगर कभी बिल लिग्नेट जैसे चित्रकार ने वेताल की आँखे दिखने की घृष्टता की भी तो उन्हें तुरत-फुरत बाहर का रास्ता दिखा दिया गया । 
अब ऐसे में क्या आप कल्पना कर सकते हैं की इस कहानी में वेताल का चेहरा एक नहीं बल्कि दो-दो बार बड़े ही साफ़ तौर पर दिखाया गया हो ! 


सबसे पहली बार तो नवें वेताल का चेहरा तब दिखाया गया जब अपने पिता की मृत्यु के बाद उसने वेताल पोशाक तो पहन ली लेकिन बांदार बौनों द्वारा अपने छोटे कद का उपहास उड़ाने से जन्मी हीनभावना और अशिक्षित होने की वजह से पनपे आत्मविश्वास की कमी के चलते उसने तब तक वेताल बनने को मना किया जब तक वो खुद को इस महान गौरव के लायक साबित न कर दे ।























ठीक है इस प्रकरण में चेहरा दिखाने की वजह यदि यह कही जा सकती है कि चूँकि किट-4 उस समय तक खुद को वेताल के पदवी के लायक नहीं समझता था इसलिए उसने पहले अपने पिता की हत्या का बदला लेकर खुद को इस पदवी के लायक बनाना मुनासिब समझा,और चूँकि अपने पिता की हत्या का बदला लेने वाले कारनामे के दौरान वह वेताल नहीं था इसलिए उसका चेहरा दिखाना कतई तौर पर किसी वेताल-मानक को भंग नहीं करता । लेकिन उसके अपने पिता की हत्या का बदला ले लेने और बांदार बौनों का भरोसा जीत कर आत्मविश्वास और अभिमान के साथ वेताल-पोशाक धारण करने के बाद भी उसका चेहरा दिखलाया गया !! यह देखिये ।























यह तो बड़े ही साफ़ तौर पर उन वेताल-मानकों का उल्लंघन हैं जिन्हें किसी और ने नहीं बल्कि खुद ली-फाल्क ने ही स्थापित किया था क्योंकि इस कहानी के और 30 वर्षों से वेताल के चित्रकार रहे साईं बैरी खुद के (अ)विवेक से ऐसा कुछ करेंगे इसका कदापि कोई औचित्य नहीं बनता । 

खैर,जो भी हो उससे इस कहानी की रोमांचकता और लोमहर्षकता पर कोई असर नहीं पड़ता जिसे आप स्ट्रिप के रूप में भी पढ़ सकते हैं और रंगीन पन्नो पर भी जिसे डायमंड कॉमिक्स ने प्रकाशित किया था ।

स्ट्रिप के रूप में इस कहानी को पढ़ने वाले नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें ।



रंगीन पन्नो पर डायमंड संस्करण को पढ़ने के दिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :






  

















डायमंड संस्करण डाऊनलोड कीजिये 


उम्मीद है आपको इस वेताल कथा पर यह तब्सिरा पसंद आया होगा । यदि हाँ तो अपने विचार,प्रतिक्रियाएं,सुझाव,आलोचनाएं इत्यादि बाँटने से गुरेज़ कदापि न करें ।

27 comments:

Vijay Kumar Sappatti said...

ज़हीर भाई , मैं तो आपकी मेहनत को सलाम करता हूँ.
अच्छा सबसे पहले तो माफ़ी , मैं कई बार आपके ब्लॉग पर आकार आपकी पोस्ट पढ़ तो लेता हूँ. लेकिन कमेन्ट नहीं दे पाता हूँ, लेकिन आज इस पोस्ट पर कमेन्ट देना जरुरी इसलिए है कली , ये एक बहुत अलग तरह की पोस्ट है , जिसने कई नयी बातो को बताया है . और इसके लिए आपको धन्यवाद देना बहुत जरुरी है ..
सोच रहा हूँ की एक बार कॉमिक्स को लूटने के लिए आपके घर आ ही जाऊं .

आपका

विजय

मोहम्मद कासिम said...

bahut si nayi bate janne ko mila betal ke bare mein. maine kabhi inderjaal nahi padhi thi bachpan me. abhi net par hi padhi... mast hai...
scply betaal

HojO said...

Nice story!This was the last *new* strip published in DC-P,as after that all were reprints,sadly!

While Ijc stopped at s133 and dc did some local 'work' on the original strips(say stertching,cropping etc),one Bengali magazine 'Anadamela' published these unedited strips in Bengali with full-color on glossy pages.So,after s133 and specifically from s136 & s138 onwards,those were only colored unedited source I have ever seen!(Btwn,The treatment s134,s135 & s137 received from dc were below-par,I think.The earliest 15-17 Phantom digests were best done by DC though!)

PS - AM still publish the current sundays in color but now the craze is much down!

Comic World said...

Vijay Kr.Sappatti: विजय भाई ये आप जैसे दोस्तों की हौंसला-अफज़ाई ही है जो मुझे निरंतर नए तरीके की पोस्ट्स को तैयार करने की प्रेरणा देती है | अजी साहब घर आपका है जब चाहें तशरीफ़ लाइए |

Comic World said...

Mohd Qasim : Thanks and you are welcome.

Comic World said...

Hojo: Rightly said,the initial digests were somewhat good regarding publishing quality but the treatment deteriorated subsequently.
If possible then post some of the pages of AM of those strips.

VISHAL said...

निसंदेह ! अगर वेताल परंपरा और पुरखों की बात की जाये तो यह एक उत्कृष्ट और अविस्मर्निये गाथा है ! एक नयी परंपरा का उल्लेख जो इस कहानी में है वो मैंने पहले किसी और वेताल कथा में इतना विस्तृत तरीके से नहीं पड़ा की वेताल के बच्चों को बारह वर्ष का होने पर अपनी माँ के शहर जाना होता है पड़ने के लिए लेकिन इसी परंपरा को ली फाल्क नें इसी कहानी में ही बेहद खूबसूरती से तोडा 'रनट' यानि की चोथे पुत्र के रूप में जो की बीहड़ वन में ही जवान हुआ और अपनी माँ के शहर नहीं गया
एक और परंपरा जिसे ली फाल्क नें तोडा - वेताल को पांच फुट और ढाई इंच का दिखला कर , अब बोने तो इस सच्चाई से वाकिफ हैं की वेताल अमर नहीं है , मगर बाकि कबीले वालों को कैसा लगा इस छोटे कद के वेताल को देख कर जो यह मानते हैं की "चलता फिरता प्रेत अमर " है , क्या उन्हें 'झटका' नहीं लगा की कैसे 6 फुट से ऊँचा वेताल साडे पांच फुट से भी छोटा हो गया !! इसी कहानी में जब कबीले के मुखिया 'रनट' यानि की चोथे पुत्र यानि की नोंवे वेताल के शादी समारोह में सम्मिलित होते हैं तो क्या उनका यह मिथक नहीं टूटता है नोंवे वेताल के छोटे कद को देखकर की वेताल अमर है ? पता नहीं क्यों ली फाल्क इस विषय में 'मौन' क्यों रहे ? अब जंगल वाले इतने भी नासमझ नहीं है जो कद काठ में अंतर न देख पाएं ! एक और वेताल परंपरा जो इस कहानी में टूटी वो यह की पहली बार वेताल का सबसे छोटा पुत्र अगला वेताल बना !
अगर चुनिन्दा वेताल कथाओं की बात चले तो यह कहानी तो शत प्रतिशत इस श्रेणी में शुमार होती है , वैसे आठवें वेताल का लगाव शुरू से ही अपने चारों पुत्रों से ज्यादा रनट की और ज्यादा रहा है , तभी तो वेताल एक दम से नाराज हो जाता है अपने तीनों पुत्रों को रनट को गेंद की तरह उछालते देख कर ! बाल मन पर जब कोई चोट लगती है तो कैसी मनोदशा होती है , इसे ली फाल्क नें एक दृश्य में खूब अच्छी तरह से दिखलाया है जब छोटा रनट अपनें बौनेपन से दुखी होकर घर छोड़ कर जंगल में भाग जाता है यह कह कर की " अब में जंगल में ही रहूँगा और (सुबकते हुए ) बेर खाकर ही जिन्दा रहूँगा " ! बहुत खूब , पीछे बब्बर और आगे तेंदुआ होने पर भी नहीं घबराया बालक रनट !
लम्बे होने के लिए रनट नें क्या कुछ नहीं किया . पेड की डाली पर लटकर अपनी टाँगे भी खिचवाई , और कसरत करने का अनोखा तरीका जो मैंने आज तक की फिल्म तक में नहीं देखा , वेट लिफ्टिंग की शुरुयात की रनट नें बछड़े को उठा कर और युवा होते होते एक बैल को उठा लिया अपनी गोदी में ! जोरदार दृश्य !!
कॉमिक भाई अपने इस कहानी के एक ही पहलु पर ज्यादा तवज्जो दी है ! यां अगर मैं यूँ कह दूँ की आपने इस पोस्ट को थोडा जल्दी में पोस्ट कर दिया ! एक कहानी में 6 फुट लम्बी पॉवर हॉउस राजकुमारी बाट्टा का जोरदार किरदार भी है , जिसे पहली नजर में आठवां वेताल भी भा गया था पर उम्र की वजह से बात आगे नहीं बड़ी ,पर नोंवें वेताल यानि रनट की बैजौड़ ताकत देखकर यह अपना दिल उसे दे बेठी , देखा आपने की कैसे रनट घोड़े पर ही बैठकर आपने दोनों हाथ खोल कर दो पहरेदारों को गर्दन से पकड़कर घोड़े पर बेठा ही महल की सीडियों से होते हुए सीधा जातुन खान के सामने ला पटकता है
राजकुमारी बाट्टा नें यह प्रण लिया हुआ है की जो भी पुरुष उसे मुकाबले में हरा देगा वो उसका पति होगा , रनट का रूमानी पहलु भी तब बाहर आता है जब वो यह कहता है की "इतनी खुबसूरत लड़की के हाथों मरनें का भी कोई दुःख नहीं " , जब राजकुमारी बाट्टा रनट को युद्ध के लिए अपना मनपसंदीदा हथियार चुनने को कहती है तो रनट के यह शब्द बाट्टा के पत्थर दिल को पिघलाते चले गए " बिना हथियार ही ठीक रहेगा , इससे 'नजदीकी' बनी रहेगी ;)"
और राजकुमारी बाट्टा इस 'नजदीकी' शब्द को सुन कर जिन्दगी में पहली बार किसी लड़की की तरह शरमायी ! और आपने 'रनट - बाट्टा' के इन प्रेम प्रसंगों का जिक्र तक नहीं किया अपनी पोस्ट में !!! आखिर क्यों ?

आपने अब तक जितनी भी वेतालों पर पोस्ट की है यह पोस्ट उन सब से हट कर है , पोस्ट की गुणवत्ता आपकी 'जंगल गश्तीदल' वाली पोस्ट की श्रेणी से भी ऊपर है क्योंकि एक तो यह वेताल पुरखों पर आधारित है और दूसरा इस पोस्ट से वेताल परंपरा के कई रहस्य पाठकों के सामने उजागर हुए , इस दुर्लभ विषय पर पोस्ट तैयार करना वैसे ही बेहद मुश्किल हैं क्योंकि इस पर ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है , पर आपने कर दिखलाया कॉमिक भाई !

वेताल के जन्म-मास उत्सव पर इससे बड़ी दावत और क्या चाहिए पाठकों को !

Vidyadhar said...

Thanks Zaheer bhai...

HojO said...

Last year,I have posted some scans of ol' Phantom sundays from magazine 'Desh'(sundays upto s136 were published there).Later,s137 onwards strips were added in AM.
Will scan few more pages soon...
---------
One can check a few scans in these following blog posts:

http://dara-indrajal.blogspot.in/2011/02/bengali-phantom-sunday-strip-pages_24.html

http://dara-indrajal.blogspot.in/2011/06/bengali-phantom-sunday-strip-pages.html

Comic World said...

Vishal Sharma: विशाल भाई सबसे पहले तो आपको आपकी इस छिद्रावेशी कमेन्ट क लिए धन्यवाद् और उसके बाद आपकी परखी नज़र की भी दाद देना पड़ेगी जिसने यह ताड़ लिया की मैंने पोस्ट जल्दबाज़ी में पोस्ट की |
जी,हाँ यह पोस्ट जल्दबाज़ी में पोस्ट करने की वजह से कई सारे पहलू छूट गए जिसमे राजकुमारी वाट्टा का ज़िक्र,डायमंड अनुवादक का उच्चकोटि का अनुवाद, रंट की मनोदशा,वेताल का रंट को पढ़ने के लिए अमेरिका न भेजना जैसी और भी कई बाते शामिल थी |

दरअसल इस पोस्ट को मैं शनिवार की शाम से तैयार करने बैठा था जो नेट की धीमी गति के चलते देर रात तक भी ये पूरी नहीं हो पाई थी,और रविवार की सुबह जल्दी उठकर इस पोस्ट को पूरा करा गया क्योंकि रविवार को और भी कई सारे काम रहते हैं इसलिए सुबह तक जितनी पोस्ट पूरी हो पाई उतनी मैंने कर दी थी क्योंकि आमतौर पर मैं एक ही सिटिंग में पोस्ट मुक़म्मल करने को तरजीह देता हूँ |

खैर,जितने भी पहलु छूट गए थे वो सब इन कमेंट्स के ज़रिये पूरे कर लिए जायेंगे जैसा की आप कर ही रहे हो | आपने बात की है कि बौने कद के वेताल को देखकर क्या जंगल के मुखिया चौंके नहीं होंगे और उन्हें वेताल के अजर-अमर होने पर शुबहा नहीं हुआ होगा तो इसका जवाब है कि चूँकि जंगल वालों के लिए वेताल एक चलता-फिरता प्रेत है जो कई मायावी शक्तियों का मालिक है,जिसके साथ कई दन्त कथाएँ जुडी हुई है,जो एक समय में कई जगह हो सकता है,जो पक्षी की तरह उड़ भी सकता है(गंडोर देवता वाली कथा) तो वो अपना कद क्यों नहीं बदल सकता !!
वैसे भी जंगल वाले किन्ही ख़ास अवसरों पर ही वेताल से रूबरू हो पाते हैं तो ऐसे में उन्हें वेताल के कद में कमी भी वेताल की कोई माया ही लगी होगी जिसका उन्होंने अपने बच्चों से बाद में ज़रूर ज़िक्र किया होगा की वेताल तो अपना कद भी बदल सकता है |
जारी है....

VISHAL said...

कॉमिक भाई , अगर आपने वेताल परम्परयों को तोडती हुई लाजवाब पोस्ट दर्शाई है तो आप भी अपनी 'एक ही सिटिंग' में पोस्ट तैयार करने की परंपरा को तोडिये जिससे की ऐसी और भावी पोस्टों की भव्यता को और चार चाँद लगाये जा सकें !
जहाँ तक इस कहानी का सवाल है तो यह वेताल की शीर्ष दस कथायों में से एक है ! सच कहूँ तो मुझे यह कहानी याद नहीं थी , आपने जब पोस्ट किया तो मैंने अपनी अलमारी में से यह दोनो अंक निकाल कर पड़े और अपने आप को कोसा भी की कैसे मैं इस अनमोल कहानी को भूल गया , पर जैसे जैसे पन्ने पलटता गया , यादें ताजा होती चली गयी ! क्या करें ! कोहलु के बैल की तरह रोज घूमते घूमते काफी कुछ भूल गया हूँ पर आप जैसे दिग्गज जब ऐसी पोस्ट करतें हैं तो सब कुछ धीरे धीरे याद आना शुरू हो जाता है
हम्म्म , आपका यह कहना की जंगल वाले छोटे कद के वेताल को देख कर आश्चर्यचकित नहीं हुए बल्कि एक और किवदंती की शुरुयात हो गयी की वेताल अपना कद भी बदल सकता है ! आपका यह तर्क बिलकुल सही और सटीक बेठता है ! अब इस बारे में कोई शक नहीं उठता
इस कहानी को पढनें के बाद दो और शंकाएं मन में उपजी , अब मैं तो ली फाल्क की मनोदशा आप की तरह पड़ नहीं सकता इसलिए मेरी दो और शंकाएं यह हैं :
(१) ली फाल्क नें मध्यम कद के वेताल के लिए 6 फुट की राजकुमारी का ही चयन क्यों किया ?

(२) कबीले वाले रंट की माता यानि आठवें वेताल की पत्नी को रंट की पूर्व पत्नी के रूप में ही देखेंगे ना ! क्योंकि उनकी नजर में तो वेताल अमर है जो कई शादियाँ कर सकता है क्योंकि वो सदा जवान रहता है , तो क्या रंट को भी इस विषैले परंपरा रूपी दंश को सहना पड़ा कबीले वालों के यकीन को बरकरार रखनें के लिए , क्योंकि जंगल किवदंती तो यह ही है की वेताल एक ही है और उसकी जननी भी एक ही है , अगर कबीले वालों की नजर से देखा जाये तो वेताल अब तक 42 शादियाँ कर चुका है !
क्या आपको नहीं लगता की इस संधर्भ में ली फाल्क चूक कर गए ?

चर्चा अभी जारी है ...................

PBC said...

Glad to see you in mood like 2007.

Keep it up!

Comic World said...

Vidhyadhar: You are welcome Bro.

Comic World said...

Hojo: Yeah,i remember to check these Sunday pages at your blog.There is no doubt about the superb coloring/inking quality of these strips published in AM magazine due to which the overall beauty of these strips has increased manifolds.
Though i don't know Bengali but still these attractive AM strips are luring me to watch them again and again.
I seriously wish if you can convert the bengali fonts of these strips in English one for non-bengali reader like us.
In either case looking forward to see more such colored AM strips from your side and specially S-137.

Comic World said...

PBC: Thanks Prabhat.

Comic World said...

Vishal: विशाल भाई मैं कोशिश करूँगा की भविष्य में जब तक किसी भी पोस्ट के मुताल्लिक सारे ख्यालों को शब्दों की शक्ल में पोस्ट पर चस्पा नहीं कर देता तब उसे पोस्ट न करूँ |

आपके शुबहात(शंकाएं) वाजिब हैं लेकिन उनके सबके माकूल जवाब भी है अब जैसे की ली-फाल्क ने पाँच फुट के वेताल की शादी छः फुट से भी ज़्यादा लम्बी राजकुमारी से इसलिए करवाई होगी ताकि इनके बच्चे यानि भावी वेताल बौने कद के न होकर लम्बे कद के हो |

और जहाँ तक आपके दूसरी शंका का प्रश्न है तो गहन जंगल के आदिवासियों में बहु-पत्नी प्रथा एक बहुत ही आम बात है आर कई-कई कबीलों में तो अधिकाधिक पत्नी रखने वालों को सम्मान और ऊँची नज़रों से देखा जाता है तो एक तरह से वेताल का बहु पत्नी रखने का भ्रम उसकी किवदंती और जंगल में उसकी स्थिति को मज़बूत ही करता होगा और जंगल वाले यह कहते नहीं थकते होंगे की चलता-फिरता प्रेत जिसकी ४० से भी अधिक पत्नियाँ है और जो सिर्फ वेताल के ही बस की बात है |

ऐसे ही हर कहानी से जुड़े बहुत सारे प्रश्न/शंकाएं हैं जो आप जैसे सुधि वेताल मित्रों से चर्चा के दौरान खुल कर बाहर आते हैं |

VISHAL said...

वाह कॉमिक भाई वाह ! वेताल से जुडी हर शंका का निवारण है आपके पास !
क्या आपने एक दृश्य पर गौर फ़रमाया जब जातुन खान कहता है की मेरी बेटी की शादी यह जंगली "savages " नहीं बल्कि मैं करूँगा तो एक कबीले के मुखिया को "गुरर्र " करते हुए दिखलाया गया है , मजेदार दृश्य है यह
और एक दृश्य में जब रंट को पता चलता है की जातुन खान बीहड़ वन में आ चूका है तो वो आपने तीनो भाईओं के साथ अंतिम आदमी तक लड़ने की शपथ लेता है तो वेताल का एक भाई कहता "और अंतिम औरत तक" और मन ही मन यह कहता है की 'क्या औरत है' ! ऐसा मालूम जान पड़ता है की वो भी 6 फुटी वाट्टा पर लट्टू हो चूका था :)

बरेली से said...

मित्र, विशाल जी को धन्यवाद और उनकी पारखी नजर को सलाम! मुझे तो इसमें बहुत आनंद आता है कि आप

मुझे उस अवस्था में पहुंचा देते हैं जब मैं ८-९ बरस का था और तब से २२-२३ बरस तक पन्द्रह साल इन कामिक्स

का खूब लुत्फ उठाया. अब भी पढ़ता हूँ, बस मेरे बच्चों को यह नसीब नहीं. क्या जमाना आ गया. जहीर भाई

की मेहनत को तो क्या लिखूँ, इतनी मेहनत हर किसी के बस की बात नहीं. हैट्स ऑफ! और इनकी पोस्ट पर

कमेंट्स, माशाअल्लाह, कितनी खूबसूरती बढ़ा देते हैं, कहा नहीं जा सकता. अवर्णनीय आनंद देते हैं.

अकल्पनीय, विस्मयकारी अवस्था में पहुँचा देते हैं आपके लेख...

Comic World said...

बरेली से: दयानिधि भाई बहुत धन्यवाद् इन खूबसूरत अल्फाज़ों का | आप जैसे पाठकों की बदौलत ही मुझे प्रेरणा मिलती है लगातार लिखते जाने की | एक बार फिर आपका तहेदिल से धन्यवाद |

http://www.halffry.com said...

I just bookmarked your blog. Thanks.

Shubham Dixit said...

friends to read my poems go to http://shubhamdixit.blogspot.in/

Lalit oberoi said...

ज़हीर भाई, सबसे पहले तो आपसे माफ़ी मांगना चाहूँगा, ब्लॉग पे मैं पिछले १ साल से कोई कमेन्ट नहीं कर सका. अभी कोई सफाई भी नहीं दूंगा, क्योंकि बहाना बनाना बेकार है, बस इतना कहूँगा की ब्लॉग पे मैं अक्सर आता हूँ, लेकिन सिर्फ पड़ता था, आपको हमेशा याद रखा .. बस मेल या कमेन्ट नहीं कर पाया.

आपका बहुत बहुत शुक्रिया आपने मुजहे याद रखा, वो पोस्ट जिसमे आपने मैगजीन स्केन्स पोस्ट किये हैं, अपने मेरा ज़िक्र भी किया .. किस मुह से आपका धन्यवाद दूँ. आपके सभी पोस्ट बेहतरीन होते हैं, लेकिन लगता है कुछ वक़्त से आपने काफी कम कर दिया है, हम समाजह सकते हैं आपकी मजबूरी, इतना वक़्त निकलना मुश्किल ही होता है, लेकिन महीने में १ पोस्ट तो बनता है बॉस .. :)

आप इसी तरह अपने खजाने से हीरे चुन चुन कर हमें दिखाते रहे, इसी आशा के साथ .. अभी अलविदा .. और उम्मीद है आप जल्द ही अमिताभ का कोई बेहतरीन artile मैगजीन में से स्कैन कर के पोस्ट करेंगे .. :)

आपका दोस्त
ललित

Comic World said...

ललित भाई आपका स्वागत है,जी हाँ आजकल कुछ वक़्त की कमी के चलते और कुछ जोश की कमी के चलते पिछले तक़रीबन दो महीने से कुछ नया पोस्ट नहीं कर पाया हूँ | दरअसल पोस्टिंग के इस हातिमी काम में आप कैसे पाठकों की कमेंट्स बहुत मायने रखती है क्योंकि ये आपकी कमेंट्स ही हैं जो मेरे हौंसले में वलवला पैदा करती हैं वरना तो इस नेकी कर और कुँए में डाल जैसे काम में आखिर एक ब्लॉगर कब तक और कितना वक़्त लगा सकता है |

फिल्मों पर और खासतौर से अमिताभ और उनकी फिल्मों पर कुछ नवीन और कुछ नया लिखने-पढ़ने की तमन्ना मेरी हमेशा से रही है | पढ़ता तो मैं रहता ही हूँ लेकिन उनपर लिखने के लिए मुझे आप सबकी अधिकाधिक कमेंट्स की ज़रुरत रहती है जो मुझमे नयी पोस्ट्स तैयार करने लायक जोश भर सके |

तो ऐसे में आप समझ सकते हैं की आप सबकी तहेदिल से लिखी गयी कमेंट्स मेरे लिए कितनी और किस किस्म के मायने रखती है |

aditya M said...

Zaheer Sahab

Nayab prastuti.
parkhi nazar or bhasha ki saafgoi

aap 1 umda insaan hone ke sath sath parkhi nazar ke swami bhi hain

men apne apne ko is layak to nahi manta ki meri tareef se aap ki kuchh haunsla afazaai ho sake...

han ye zarur kahunga ki lee falk sahab ki ye kaal jayi rachna ko aap ke chand shabdon se naya rang zarur mila

aasha karta hun aap yun hi hum mitron men apna khazana lootate rahenge

aap ka mitra

Aditya

rt said...

Kya kahu ye pad ke apna khoya bachpan yaad aa data jauise hi comics ka set aata tha Poora Rent per la kar au Ek din mein khatam kar deta tha..per aaj hamare bache DVD aur Video Games se aage sochate hi nahi.....Please aap ise band mat karna verna lagega bachgpan phir gum gaya

imran said...

zaheer bhai.. mere pass alfaaj nhi hai bayaan karne ko..mene sari post padhi ..mujhe kuchh sujh nhi rha ki me kya kahu..bs man kar rha hai ki kahi se ye comics mil jaye to vapas padhu..mene ye comics padhi hai..lekin jab aapka ye post padha to puri ki puri kahani yaad aa gyi jo me bhool gya..aapki information vetaal k bare me kamaal hai..aap apne ilm se hame aise hi nawajte rhe..bahut bahut shukriya..

Abhishek Bardhan said...

Zaheer bhai, Link is showing deleted.. Pl provide alternate link

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