Monday, January 7, 2013

# Mohammad Rafi

31 जुलाई 1980 के दोपहर के करीब 12 बजे का समय रहा होगा जब मशहूर और मारूफ़ गुलुकार मो रफ़ी अपने घर पर आराम कर रहे थे तभी उन्हें पेट और सीने में भारीपन सा महसूस हुआ जो उन्हें बदहज़मी की वजह से होता लगा और जिसके चलते उन्होंने घरेलु नौकर से सोडा मिंट की गोली मंगवा कर खा ली जिसके कुछ देर बाद उन्हें आराम महसूस हुआ और वे आराम करने लगे । 
लेकिन 4 बजे के आसपास उन्हें फिर दर्द महसूस हुआ और इस बार शिद्दत के साथ,उन्होंने फ़ौरन घर में मौजूद अपनी बीवी को बुलाया जो उनकी उखड़ती साँसे और नीले पड़ते होंठों को देख घबरा गयी । फ़ौरन नज़दीकी डॉक्टर को बुलवाया गया जिसने उनकी जांच करने के बाद उन्हें नेशनल हॉस्पिटल ले जाने की सलाह दी और रफ़ी साहब को उनकी कार में नेशनल हॉस्पिटल ले जाया गया ।  

नेशनल हॉस्पिटल की लिफ्ट ख़राब थी और ईसीजी रूम ऊपर था लिहाज़ा रफ़ी साहब खुद सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गए जहाँ लम्बी जांच के बाद पता चला कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा है और उन्हें फ़ौरन मुंबई हॉस्पिटल ले जाने की सलाह दी गयी क्योंकि नेशनल हॉस्पिटल में दिल के दौरे के इलाज की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी । लिहाज़ा मुंबई हॉस्पिटल के इंचार्ज से बात कर रफ़ी साहब शाम के 7 तक बजे वहाँ पहुँचे जहाँ उनका मुक़म्मल इलाज शुरू हुआ लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि दौरा पड़ने के बाद से बेहद कीमती समय हॉस्पिटल के चक्कर काटने में जाया हो चुका था । बीच में रफ़ी साहब की तबियत कुछ संभली और उन्होंने अपने साथ मौजूद घर वालों से बात भी की लेकिन फिर जो तबियत बिगड़ी तो सम्भली नहीं और यह अज़ीमतरीन फ़नकार रात 10 बजकर 25 मिनट पर अपने करोड़ों चाहने वालों को छोड़कर इस फ़ानी दुनिया से चला गया । 






दोस्तों,उपरोक्त जानकारी हाल में ही प्रकाशित एक किताब से ली गयीं हैं जिसका कवर ऊपर की तस्वीर में दिया ही गया और जिसे लिखा है रफ़ी साहब की बहु यास्मीन ख़ालिद रफ़ी ने । रफ़ी साहब की गुलूकारी और मौसीकी से गैर-मह्दूदी इश्क़ करने वालों के लिए इस क़िताब की क्या अहमियत होना चाहिए और उन्हें यह क़िताब हर हाल में क्यों पढ़ना चाहिए इसपर तो मैं आने वाली सतरों(लाइन्स) में तफ़सील से बात करूँगा ही लेकिन उससे पहले ज़रा मुझे इजाज़त दीजिये कि मैं रफ़ी साहब के बारे में अपनी सोच और अपने जज़्बात पेश कर सकूँ जिनकी रू में बंदा आपको इस इस क़िताब की अहमियत समझाना चाहता है ।  

मुझे याद नहीं है कि रफ़ी साहब की गुलूकारी से मैं कब और क्यों इस क़दर का मुतास्सिर हुआ । शायद बचपन में रेडियो पर सुने जाते उनके गानों की वजह से क्योंकि तब हर तरफ़ उनके ही गानों का बोलबाला था । हालाँकि पसंद तो मुझे किशोर कुमार और मुकेश के गीत भी आते थे लेकिन जो बात रफ़ी साहब की आवाज़ में मैंने महसूस की उसका कोई सानी नहीं । उनकी पिघले सोने जैसी आवाज़ जो दिल में उतर जाती थी और जिसकी तासीर से रूह तक झूम जाती थी उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं ।
'धर्मवीर'(1977) जो उस वक़्त की मेरी पसंदीदा फिल्मों में से थी उसके गीत,जैसे 'ओ मेरी महबूबा,तुझे जाना हो तो जा...,सात अजूबे इस दुनिया में .....',दिल को झुमा डालते थे और मैं मंत्रमुग्ध सा सुनता जाता था । 
बाद में जब उम्र बढ़ी तो कुदरतन इस नायाब गुलुकार के बारे में और भी जानने की उत्सुकता बढ़ी जो तबकी फ़िल्मी पत्रिकाओं से कुछ हद तक तो पूरी हुई जिनमे रफ़ी साहब के फिल्मी सफ़र के बारे में जानने का मौका मिला लेकिन प्यास फिर भी न बुझी क्योंकि रफ़ी साहब के फ़िल्मी सफ़र की जानकारी तो मिली,उनकी तसवीरें भी मिली लेकिन उनके बारे में और भी क़रीबी और प्रमाणिक जानकारी कहीं पढ़ने/सुनने को नहीं मिली मसलन वह घर पर कैसे रहते थे,उनके परिवार के सदस्यों के बारे में विस्तृत जानकारी,वे अपने किसी भी पुत्र/पुत्री को गायन के क्षेत्र में क्यों नहीं लाये,उनका स्वाभाव क्या वाकई उस तरह का सूफ़ियाना था जिसका फ़िल्मी पत्रिकाओं में किसी और के मार्फ़त ज़िक्र होता था । चूँकि रफ़ी साहब के साक्षात्कार भी पत्रिकाओं में ना के बराबर मिलते थे और जो होते भी थे उनसे भी कोई गहन और तफ्सीली मालूमात हासिल नहीं हो पाती थी जिसके चलते प्यास बराबर बनी रही और जब नेट का दौर आया तब भी नेट पर तलाशने से भी उनके बारे में जो भी जानकारी मिलती थी वो या तो  अख़बारों/रिसालों इत्यादि में छपे उनके बारे में लेखों पर आधारित थी या फ़िर उनके बारे में बात करते हुए संगीतकारों और दुसरे फ़िल्मी हस्तियों के मार्फ़त जो उनके सिर्फ उस रूप को उजागर कर पाती थीं जो रिकॉर्डिंग के दौरान लोगों को देखने को मिलता था जबकि मैं उनके घरेलु और निजी रूप को बेहद क़रीब से जानने का अभिलाषी था । नेट पर उनके वीडियो साक्षात्कार भी इक्का-दुक्का ही उपलब्ध थे क्योंकि रफ़ी साहब अपनी बेहद शर्मीली तबियत के कारण इंटरव्यूज से हमेशा परहेज़ करते थे और उन इंटरव्यूज में भी वे बहुत कम बोलने वाले शर्मीले शख्स दिखे जिनसे उनके बारे में साक्षात्कारकर्ता कुछ ख़ास और अलग नहीं निकलवा पाते थे । 





लिहाज़ा दिल की चाहत दिल में ही बनी रही तब तक जब तक मुझे नेट पर रफ़ी साहब के बारे में तलाशते हुए इस किताब का पता चला जो पिछले साल अक्टूबर में ही प्रकाशित हुई है । किताब के लेखक के बारे में जानकर हौंसलामंद होकर इस किताब को मंगवा लिया गया और जिस दिन वह मौसूल हुई उसी दिन उसे पढ़ कर मुक़म्मल कर लिया गया और उसके बाद उसे एक बार और अच्छे से रुक-रुक कर धीरे-धीरे पढ़ा गया । यहाँ यह लिखने की ज़रुरत नहीं है कि मैं इस किताब से बेहद मुतास्सिर हुआ जिसके नतीजे में मौजूदा आलेख आपके सामने है । 

दोस्तों,ज़रा फ़र्ज़ कीजिये कि कोई शख्स रफ़ी साहब के बहुत बड़ा और दीवानावार प्रशंसक हो और किस्मत से अगर वह रफ़ी साहब के परिवार का हिस्सा भी बन जाये जिससे उसे रफ़ी साहब को बेहद करीब से देखने/जानने का मौका मिले तो जब ऐसा शख्स उनके बारे में कोई किताब लिखेगा तो उस किताब की अहमियत और मायने रफ़ी साहब की गुलूकारी के इश्क़ में जलते परवानों के लिए क्या होगी !
जी हाँ,इश्क़े-रफ़ी में जलते हुए मेरे हमख्याल परवानों यह किताब वही किताब है जिसका जिक्र ऊपर हुआ है और इसे लिखा है रफ़ी साहब के बेटे ख़ालिद रफ़ी की पत्नी यास्मीन ने जो अपने बचपन से रफ़ी साहब की गायकी के बहुत बड़ी वाली फैन थी इस बात से कतई बेखबर कि क़िस्मत एक दिन उन्हें रफ़ी साहब के घर उनकी बहु बनाकर भेजने वाली थी । यास्मीन जो इंदौर की रहने वाली थी और अपने बचपन से रफ़ी साहब की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं उन्हें इस बात का ज़रा सा भी गुमान नहीं था कि एक दिन वह इनके परिवार का हिस्सा बनेंगी । 

इस क़िताब में यास्मीन रफ़ी साहब और उनके रहन-सहन का बड़ी सूक्षमता से जिक्र करती हैं जो हम जैसे रफ़ी साहब के मुरीदों की बरसों से अनबुझी प्यास पर किसी आबशार का सा असर छोड़ती है । बचपन में अपना और अपनी माँ का रफ़ी साहब की गुलूकारी से लगाव और अपने मन में बनती उनकी छवि,रिश्ते के लिए जब रफ़ी साहब यास्मीन को देखने आते हैं तो उन्हें पहली बार देखने से उमड़े जज़्बात,रफ़ी साहब का अच्छे खाने ले लिए शौक़,उनके बातचीत करने का अंदाज़,बातचीत के दौरान शर्मीले अंदाज़ में कम अल्फाज़ इस्तेमाल करना,अपने बच्चों के साथ रफ़ी साहब के पेश आने का अंदाज़,अपनी पत्नी की दस बातों के जवाब में कम बोलने वाले रफ़ी का एक बात से जवाब देना.....ऐसी ही अनगिनत बातों,घटनाओं और वाकयों का आँखों देखा ज़िक्र यास्मीन बड़ी ही खूबसूरती से करती हैं और लगता ही नहीं कि वे पहली बार कोई किताब लिख रही हैं ।
इस पुस्तक में एक प्रशंसक की नज़र से आप रफ़ी साहब की आवाज़ और गायन की खूबियों और बारीकियां तो जान ही पाएंगे लेकिन अलावा आप रफ़ी साहब की निजी ज़िन्दगी के ढेरो खट्टे-मीठे वाकयों के अलावा कुछ उन अनछुए पहलुओं के बारे में भी जान पाएंगे जो अब से पहले दुनिया की नज़रों से छुपे हुए थे जैसे कि रफ़ी साहब के दो विवाह हुए थे और उनके पहले विवाह से एक पुत्र भी था । 

किताब में जैसे-जैसे यास्मीन रफ़ी साहब जैसी अज़ीमुश्शान और बड़ी हस्ती की भलमनसाहत,नेकदिली, शराफ़त,सीधेपन और सरलता का विभिन्न उदाहरणों सहित दिलचस्प और ईमानदाराना तरीके से ज़िक्र करती जाती हैं वैसे-वैसे मेरी आँखों से आँसू जारी होते गए और लगने लगा जैसे कि मैं खुद उस समय और उस जगह उन सारे वाक्यातों को अपनी आँखों के सामने होता हुआ देख रहा हूँ । वो रफ़ी साहब का अपने बेटे ख़ालिद की शादी में लेखिका यास्मीन को विदाई के वक़्त अपने वालिदैन से गले मिलकर रोते देख खुद भी रो पड़ना,वो अपने अज़ीज़ दोस्त गायक मुकेश के निधन पर खुद अपनी तबियत ख़राब होने और डॉक्टर द्वारा बाहर जाने से मना करने के बावजूद मुकेश के अंतिम संस्कार में जबरन शामिल होने जाना,वो किसी मस्जिद द्वारा रफ़ी साहब द्वारा उस मस्जिद को दान किये पैसे उनकी कमाई को नाजायज़ मानते हुए लौटा देने पर रफ़ी साहब की आँखों से जारी होते आँसू,वो 'दीदारे-यार' फ़िल्म बनने में लगते समय पर उनको समय के साथ बढ़ चुके मौजूदा रेट के हिसाब से मेहनताना दिए जाने पर पहले से तयशुदा रेट के अलावा अतिरिक्त रक़म निर्माता जीतेन्द्र को वापस लौटा देना,वो फ़िल्म निर्माताओं द्वारा पैसे की तंगी के ज़रा से ज़िक्र पर उनकी फ़िल्मों में लगभग मुफ़्त में काम करना । 
ऐसे जाने कितने ही उदाहरण किताब में पेश किये गए हैं जिनसे सहज ही यह अंदाज़ा हो जाता है कि मोहम्मद रफ़ी नामक यह शख्स धरती पर सीधे,सरल,नेक,हस्सास और बड़े दिल के साथ उसकी कुदरत और अमानत के रूप में ऐसा बेमिसाल हुनुर लेकर आया था जिससे उसने उसके बन्दों को हमेशा खुश किया और उसकी कुदरत उसके बन्दों पर लुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । 

कुल मिलकर यह एक ऐसी किताब है जो रफ़ी साहब की पुरनूर गुलूकारी और उससे उनके लिए जन्मी गैर-हुदुदी दीवानगी की आग में जलते हुए मुझ जैसे शैदाइयों और परवानों की रूह की तिश्नगी को तस्कीन पहुंचाती है जो बरसों से इस गैर-मामूली हस्ती को और करीब से देखने/जानने के मुन्तज़िर थे ।

210 पन्नो वाली और रूपये 195/-(डिस्काउंट भी उपलब्ध है) कीमत वाली मूल रूप से हिंदी में लिखी गयी इस किताब का अंग्रेज़ी तर्जुमा भी बाज़ार में हाजिर है जिसे आप फ्लिप्कार्ट या होमशॉप18 जैसी ऑनलाइन दुकानों द्वारा दरयाफ्त कर सकते हैं । यदि आप रफ़ी साहब की गायिकी और शख्सियत के सच्चे मुरीद हैं तो आपको इस क़िताब को फ़ौरन से पेश्तर सकने की कोशिशें शुरू कर देना चाहिए क्योंकि मुझे उम्मीद ही नहीं बल्कि यकीन है कि इस क़िताब को पढ़ चुकने के बाद आप भी वही रूहानी सुकून महसूस करेंगे जो इश्क़े-रफ़ी के मरीज़ इस नाचीज़ की रूह को पहुँचा है ।     



   
 

6 comments:

kuldeepjain said...

पता नहीं तब कितना छोटा था पर इतना जरुर याद है कि गानों की और गायकों की समझ बिलकुल नहीं थी। माँ को गाना सुनने का शौक था और घर में एक पुराना बुश रेडियो हुआ करता था और माँ गाहे बगाहे उस पर विविध भारती जैसे कार्यक्रम सुन लिया करती थी। वो शायद फ़िल्मी गानों से मेरा पहला परिचय था। बिनाका गीत माला जो बाद में सिबाका गीत माला हो गया उस पर ध्यान आस पड़ोस में लोगो के घर जाकर हुआ जो बाद में आदत में शुमार हो गया कि सुनना ही है। अमिन सायानी साहेब की दिलकश प्रस्तुती का जादू था कि फ़िल्मी गानों की तरफ़ा रुझान गहरा रुख लेने लगी। ऐसे ही एक समय के दौरान जहा तक मुझे याद है .. शाम के 4 बजे जब मैं पढाई ख़तम कर रेडियो सुन रहा था ये गाना बजा " क्या हुआ तेरा वादा " .. गाने के शब्दों में जादू था या गाना गाने वाले में ये तो पता नहीं चला क्योकि पुरे गाने के दौरान मैं एक अजीब से सम्मोहन की गिरफ्त में आ गया . किसी फ़िल्मी गाने को लेकर इतना गहरा मैं डूबा ये कम से कम आज तक नहीं हुआ . गाना ख़तम हो गया और उसके बाद इस गाने को दुबारा सुनने की जो हुक दिल में मची उसका ये आलम था की मैं काफी दिनों तक एन उसी वक़्त पर रेडियो को ट्यून करने की कोशिश करता था कि शायद गाना फिर सुनने को मिल जाये। और साहेबान तब तक ये पता नहीं था कि इस गाने को जादू देने वाले फनकार श्री रफ़ी साहेब हैं। बाद मैं जैसे जैसे फिल्मो में रुझान बढ़ता गया , अलग अलग गाने सुनने के मौके मिलते गए, विभिन्न गायकों और गायकियो के बारे में भी ज्ञान बढ़ता गया . बाद में विभिन्न फ़िल्मी पत्र पत्रिकाओ के माध्यम से इस ज्ञान में इजाफा होता गया।
रफ़ी साहेब ने कितने गाने गाये , उनकी गायकी में क्या जादू था , कितने लोग उनके फैन क्यों है ये सब बताना एक दुहराव होगा पर एक बात जो मैंने रफ़ी साहेब के बारे अपनी अब तक अर्जित ज्ञान से जानी वो ये कि एक गायक और एक इन्सान के तौर उनके बारे में आज तक कोई भी कोई विपरीत राय कायम नहीं कर पाया . किसी गायक के बारे में यह मशहुर हुआ की वो घमंडी है या टाइप्ड है या किसी अन्य गायक को पनपने नहीं दिया या उसके किसी निर्माता निर्देशक से नहीं पटी वगेरा वगेरा मगर आज तक मेरी नज़र में ऐसी कोई बात नहीं आयी जिसमे रफ़ी साहेब के साथ ऐसी कोई ओछी बात किसी ने कहना तो दूर की बात अगर सोची भी हो।
रफ़ी साहेब के चेहरे पर नाचती वो निश्चल मुस्कान जो उनके व्यक्तित्व का परिचायक बन गयी आज भी लोगो के दिलो में कायम है। मेरा दावा है रफ़ी साहेब को याद करते ही इस मुस्कान से भरी उनकी तस्वीर तुरंत ही जेहन में ताज़ा हो जाती है।
मैं कोई गायक नहीं पर अच्छे गानों को सुनने का शौक जरुर है . संजीदा गाने सुनने का दायरा बहुत छोटा है . मस्ती भरे गाने कई गायकों ने गाये है पर जो गाने इन सब विधाओ में रफ़ी साहेब ने गाये है उन्हें सुनकर ऊपर वाला भी हैरान होता होगा की यार ऐसा जादू मेरे बनाये इन्सान कर रहा है . मैं खुद इस जादू से परे नहीं। चन्द गाने जिन्हें सुनकर मैं मदहोश हो जाता हु वो कुछ इस तरह से है।।
1. क्या हुआ तेरा वादा ... हम किसी से कम नहीं
2. तू इस तरह से मेरी जिंदगी .. आप तो ऐसे न थे
3. तुमसे दूर रह के .. अदालत
4. कौन किसी को .. कालिया
5. पूछो न यार क्या हुआ .. ज़माने को दिखाना हैं
हिंदी फिल्मो की कव्वालियो का जिक्र हो और रफ़ी साहेब का नाम न आये मुमकिन नहीं। आज भी पुराणी फिल्मो की कव्वालिया रफ़ी साहेब के कारण ही गुलजार है।
रफ़ी साहेब की याद , उनका जादू इस फानी दुनिया के रहते कभी मिट न सकेगा।

Comic World said...

कुलदीप लगता है तेरे और मेरे डीएनए का टेस्ट कराना होगा की दोनों में कमबख्त कितने प्रतिशत की समानता है क्योंकि 'क्या हुआ तेरा वादा,वो क़सम वो इरादा.... ' ही वो पहला गीत था जिसने मुझे भी रफ़ी साहब की पिघले सोने और जादू भरी आवाज़ से अवगत कराया जिसे सुनने के बाद मैं जैसे किसी सम्मोहन की जकड़ में आ गया था और जिसके पाश से मैं अभी तक मुक्त नहीं हो पाया हूँ । हालाँकि उस ज़माने में टेपरिकॉर्डर भी था लेकिन मेरी पहुँच से बाहर था जिसके चलते रेडियो की मोहताजी लाज़िम थी । समय के साथ 'धर्मवीर,अमर अकबर अंथोनी,परवरिश' जैसी फ़िल्मों में रफ़ी साहब को सुना गया जिसके बाद से इनका जादू सर चढ़कर बोलने लगा और मैं रफ़ी साहब के बारे में किसी भी जानकारी या खबर के लिए फ़िल्मी रिसाले खंगालने लगा लेकिन रफ़ी साहब पर गहरी और पुख्ता जानकारी की बेहद कमी थी क्योंकि यह अपने शर्मीले स्वाभाव की वजह से इंटरव्यूज बेहद कम देते थे । इनकी पृष्ठभूमि इत्यादि की ऊपर-ऊपर की जानकारी होने के बाद इनको और भी करीब से जानने की प्यास बढ़ती गयी क्योंकि मैंने इनके बारे में जितना भी पढ़ा-सुना हर जगह इनके व्यव्हार और आदत की बेहद तारीफ़ ही पाई । कभी कोई साक्षात्कार देना भी पड़ता था तो यह घबरा जाते और कहने लगते की न जाने वे क्या पूछेंगे । घबराहट के बारे में ज़्यादा पूछने पर कहने लगते की,'अपना काम सिर्फ गाना है और वही अपने बारे में बात करेगा ' ।
नेट पर रफ़ी साहब के जो दो-एक वीडियो साक्षात्कार उपलब्ध हैं अगर आप उन्हें गौर से देखेंगे तो सोचने पर मजबूर हो जाएँगे कि इस इंसान के मुंह से तो ठीक से बात भी नहीं निकलती तो यह भला गाता कैसे होगा ! इसके मुतल्लिक मौजूदा किताब की लेखिका और रफ़ी साहब की पुत्रवधू भी लिखती हैं कि,'सामान्य हालातों में रफ़ी साहब के मुंह से ठीक तरह से बात भी नहीं निकलती थी और यह जवाब भी बहुत कम अल्फाज़ों में और शॉर्टकट में दिया करते थे लेकिन जब अपने स्टेज शोज के दौरान यह गाना गाने के लिए कपड़े पहन कर तैयार होने लगते थे तो अचानक इनकी शख्सियत में बदलाव आना शुरू हो जाता था और स्टेज तक पहुँचते-पहुँचते यह पूरे मोहम्मद रफ़ी बन जाते थे और स्टेज पर गीत बड़ी ही मस्ती और खुशमिजाज़ी से गाते थे जिसे देख कर कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह उनके वही शर्मीले और चुपचाप रहने वाले ससुर हैं ' ।
खैर,रफ़ी साहब के लिए मैं क्या लिखूं,क्या कहूँ क्योंकि दिल में जो जज़्बात हैं उन्हें शब्दों द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है । जब भी इनका कोई गीत सुनता हूँ तो इनकी सधी हुई कलपा देने वाली आवाज़ सुनकर उस अल्लाह की तारीफ़ में सर झुक जाता है जिसने ऐसे इन्सान को बनाया ।

बरेली से said...

जहीर भाई, दिल को छू लिया. ये तो सुच्चा सोना थे. कानों से दिल में जाते थे. सीधे.

DINAS said...

hi comic guy,

is there any more issues of inspector azad which u can share?

thanks.

parag said...

Zaheer Bhai,
Rafi sahab ke baare mein duniya ko kuch aur batana bahut mushkil hain.Iss mudde par bahas ho sakthi hain ki vo insaan jyadha behtreen the yaa gaayak.
Lakhsmi Pyare ne kahi kahah bhi hain ki upper wala shayad gayak tou unse behtar bana bhi de, insaan dobara aisa nahi bana payega.
Vo ek aise insaan the,chaahe royalty ka mudda ho yaa gaayak ki fees ka,Rafi sahab ne wahi kiya/ wahi kaha, jo unko sahi laga. Apne CA ke hisaab se kabhi rai nahi di.Aaj ki duniya mein isse ek aisi kami bataya jaata hain, jise kehte hain busibess sense ki kami hona.
Pehle vividh bharti mein filmi kalakaron se sakshatkaar se jure programon ko jab suna karthe the, to jab bhi LP, Anwar, Mahendra Kapur ko suna,to un sabhi ne rafi sahab ko ek aisi shakshiyat bataya, jo ki karobaari filmi duniya ke liye bani hi nahi thi.
Jab Aradhana ( Kishor, RD,Kaka ke daur ke samay ) ke baad unka down fall aaya, tab bhi shayad unke chahne waalon ko jyadha dikkat huyi, kintu rafi sahab ne kabhi bhi isski shikayat nahi ki.
Kishor Kumar bhi bahut bare gaayak the, kintu unko bhajan ya desh bhakthi ke gaane gane mein maharat nahi haasil ho sakhi. Saari range ke gaane gane ki kala to rahi sahab ke pass hi thi.
Mera jo anubhav raha hain jeevniyon ko parne ke baare mein, vo yahi hain ki nikat sambandiyon ke dwara likhi gayi jeevniyan adhikaansh samay vaastiviktha se bhatak jaati hain.
Kai baar to vo "Raaso" granth mein tabdil ho jaati hain, jaha ki prashansha aur sirf prashansha hi bhari hoti hain.
Unka gaano ke baare mein nirnay lena ki kauna sa behatareen hain, kausa behatareen se behatareen hain, kum bahatareen hai, bahut hi duruh karya hain. Iss ke liye hum ko bahut saare paane kaale karne parenge aur likhne ke liye Ganeshji ki madad leni paregi

Comic World said...

पराग भाई मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि यह फ़ैसला करना कठिन था की रफ़ी साहब इन्सान ज्यादा अच्छे थे या गायक । जहाँ तक इस किताब की बात है जिसके बारे में पोस्ट लिखी गयी है तो इस किताब में रफ़ी साहब की गायकी से ज़्यादा उनके इंसानी पहलु पर तवज्जो दी गयी है जिसके कारण से ही यह किताब मुझे इस क़दर की पसंद आई क्योंकि रफ़ी साहब की गायकी के बारे में तो हमने बहुत सुना और बहुत पढ़ा लेकिन उनके इंसानी रूप को सिर्फ वही अच्छी तरह से पेश कर सकता है जो खुद उनके साथ रहा हो और यह रफ़ी साहब की पुत्र वधु ने बखूबी किया है । चूँकि इस किताब की लेखिका रफ़ी साहब की पुत्रवधू हैं इसलिए वह और अभी अच्छे से न्यूट्रल तरीके से रफ़ी साहब का आकलन कर पाई हैं जो उनके बच्चों में से अगर कोई किताब लिखता तो शायद न कर पाता और इसलिए ही यह किताब पढ़ने और सहेजने योग्य है ।

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